भारतीय शेयर मार्केट भीषण तबाही का शिकार है । तबाही का आलम यह है कि सोमवार, 28 सितंबर, 2026 को भारतीय शेयर बाज़ार में बड़ी गिरावट देखी गई, जब BSE सेंसेक्स 1,124.02 पॉइंट (1.52%) गिरकर 72,771.72 पर बंद हुआ। वहीं, NSE निफ्टी 50 360.25 पॉइंट (1.56%) गिरकर 22,780.25 पर बंद हुआ। मंगलवार, 29 सितंबर को भी गिरावट जारी रही, सेंसेक्स 243 पॉइंट और निफ्टी 0.28% और नीचे आ गया। दो दिनों में कुल मिलाकर निवेशकों की लगभग ₹15 लाख करोड़ की दौलत साफ हो गई, जिससे BSE-लिस्टेड कंपनियों का कुल मार्केट कैपिटलाइज़ेशन घटकर लगभग ₹469 लाख करोड़ रह गया। यह सिर्फ आंकड़े नहीं, करोड़ों आम निवेशकों, पेंशनधारकों और मध्यम वर्ग की जिंदगी का सवाल है।
फॉरेन पोर्टफोलियो निवेशकों (FPIs/FIIs) ने 2026 में भारतीय बाजार से रिकॉर्ड पैसा बाहर निकाला है। साल के पहले आठ महीने और 10 दिनों में ही उनका नेट आउटफ्लो ₹2,37,579 करोड़ तक पहुंच चुका है, यह अब तक का सबसे बड़ा वार्षिक बिकवाली है। सितंबर 2026 में अकेले ₹23,000 करोड़ से ज्यादा बाहर निकले। सितंबर की पहली 10 ट्रेडिंग सेशन में ही ₹13,138 करोड़ की बिकवाली हुई। छह लगातार हफ्तों से FIIs नेट सेलर बने हुए हैं। 28 और 29 सितंबर को मिलाकर FIIs ने ₹19,000 करोड़ से ज्यादा के शेयर बेचे। यह सिर्फ संयोग नहीं, बल्कि भारत की अर्थव्यवस्था पर विदेशी निवेशकों का भरोसा टूटने का संकेत है। 
भारतीय बाजार के क्रैश के पीछे कई वैश्विक और घरेलू कारण हैं। क्रूड ऑयल की कीमतें $108 से $120.86 प्रति बैरल तक पहुंच गई हैं, जो मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव और US-ईरान वार्ता में रुकावट का नतीजा है। भारत का 80% से ज्यादा तेल आयातित है, इसलिए हर डॉलर की बढ़ोतरी सीधे महंगाई, करंट अकाउंट डेफिसिट और रुपए की कीमत पर असर डालती है। रुपया डॉलर के मुकाबले कमजोर हो रहा है, जिससे आयात महंगा होता है और विदेशी निवेशकों का रिटर्न घटता है। US ट्रेजरी बॉन्ड यील्ड बढ़ने से वैश्विक निवेशक सुरक्षित संपत्तियों की तरफ भाग रहे हैं, और इमर्जिंग मार्केट जैसे भारत से पैसा बाहर निकल रहा है। इन सभी कारणों के बावजूद, वित्त मंत्री निर्मला सीतारमन और पीएम मोदी की तरफ से कोई बयान नहीं। न तेल की कीमतों पर नियंत्रण की बात, न रुपए को मजबूत करने की योजना, न विदेशी निवेशकों को वापस लाने की रणनीति। यह खामोशी नहीं, नाकामी है।
सितंबर 2026 भारतीय शेयर बाजार के इतिहास का सबसे बुरा महीना साबित हो रहा है। निफ्टी 50 ने सितंबर में 6.7% की गिरावट दर्ज की है, यह 2001 के बाद 25 साल में सबसे बड़ी मासिक गिरावट है। सेंसेक्स और निफ्टी दोनों सितंबर में 6% से ज्यादा टूट चुके हैं। 28 सितंबर को बाजार छह महीने के निचले स्तर पर बंद हुआ। 29 सितंबर को भी गिरावट जारी रही, सेंसेक्स 633 पॉइंट और निफ्टी 0.87% और नीचे आ गया। 14 में से 16 प्रमुख सेक्टर लाल निशान में हैं। बैंकिंग, मेटल, PSU बैंक और ऑटो स्टॉक्स सबसे ज्यादा प्रभावित हुए हैं। टेक महिंद्रा, सन फार्मा, भारती एयरटेल, इन्फोसिस, बजाज फाइनेंस, जियो फाइनेंशियल सर्विसेज जैसे बड़े नाम भारी गिरावट में हैं। इंडिया VIX, जो बाजार की अस्थिरता का संकेतक है, 16.3% बढ़कर 14.15 के स्तर पर पहुंच गया। यह संकेत है कि निवेशक घबराए हुए हैं, अनिश्चितता बढ़ रही है।
जब शेयर बाजार में 15 लाख करोड़ की तबाही हो, जब विदेशी निवेशक भाग रहे हों, और क्रूड $120 के पार हो, हकीकत यह है कि 2026 में भारतीय अर्थव्यवस्था संकट के गहरे दलदल में फंसी हुई है। महंगाई आसमान छू रही है, बेरोजगारी रिकॉर्ड स्तर पर है, किसान कर्ज में डूबा है, और अब शेयर बाजार भी टूट रहा है। क्रूड ऑयल की कीमतें बढ़ने से पेट्रोल-डीजल महंगा होगा, जिससे महंगाई और बढ़ेगी। रुपया कमजोर होने से आयात महंगा होगा, जिससे करंट अकाउंट डेफिसिट बढ़ेगा। विदेशी निवेशक भाग रहे हैं, जिससे पूंजी की कमी होगी और विकास दर गिरेगी। विश्व बैंक के मुताबिक, मध्य पूर्व संघर्ष के कारण भारत की विकास दर 7.6% से घटकर 6.6% रह जाने का अनुमान है। OECD ने FY27 के लिए विकास दर का अनुमान 6.1% कर दिया है।
गार्डियन की सितंबर 2026 की रिपोर्ट के मुताबिक, भारत के आंकड़ों पर “ट्रस्ट डेफिसिट” बढ़ गया है, सरकार ने आर्थिक डेटा को राजनीतिक फायदे के लिए हथियार बना लिया है। CNBC ने जून 2026 में लिखा कि मोदी की 12 साल की सत्ता के बाद भारत की “सबसे तेज बढ़ती अर्थव्यवस्था” वाली छवि धूमिल हो रही है। एशिया टाइम्स ने जनवरी 2026 में “मोदिनामिक्स का फास्ट-ग्रोथ मिराज” शीर्षक से लिखा कि नीतियां सिर्फ ऊपर के अमीरों को फायदा पहुंचा रही हैं, जबकि मध्यम वर्ग और गरीबों की कमाई की क्षमता कमजोर हो रही है।
अंततः यह कहना गलत नहीं होगा कि भारतीय शेयर बाजार का क्रैश सिर्फ आंकड़ों का खेल नहीं, करोड़ों लोगों के भविष्य का सवाल है। 15 लाख करोड़ की तबाही, 25 साल की सबसे बड़ी गिरावट, रिकॉर्ड FII आउटफ्लो, ये सब संकेत हैं कि भारतीय अर्थव्यवस्था संकट में है।