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हम मुकदमों से डरते नहीं, मुकदमे तो योद्धाओं का गहना हैं,पिंकी चौधरी का अपने ऊपर 38 से ज्यादा मुकदमे होने का फख्र

(काशिफ सुल्तान) गाजियाबाद, उत्तर प्रदेश हिंदू रक्षा दल के राष्ट्रीय अध्यक्ष पिंकी चौधरी ने एक वीडियो में कहा “हम मुकदमों से डरते नहीं, मुकदमे तो योद्धाओं का गहना हैं।” पिंकी चौधरी अपने ऊपर 38 से ज्यादा मुकदमे होने का फख्र के साथ दावा करता है। इसके बाद जिहादी”, “लव जिहाद” और पलायन जैसे आरोपों का जिक्र करते हुए हिंदुओं से एकजुट होने की अपील की गई ।लेकिन सवाल यह है कि एक व्यक्ति के खिलाफ इतने मुकदमे दर्ज होने के बावजूद कानून का शिकंजा आखिर इतना कमज़ोर क्यों है.?

2011, साहिबाबाद: मारपीट, गंभीर चोट, अपमान और संपत्ति नुकसान के आरोप। बाद में मामला खत्म हो गया।
2014, इंदिरापुरम: आम आदमी पार्टी के कौशांबी कार्यालय पर हमले का मामला। कई धाराओं में FIR और करीब 4 महीने जेल। मामला अदालत में लंबित।
2016, विजयनगर: सिंचाई विभाग की जमीन पर अनधिकृत धार्मिक निर्माण और पुलिस से विवाद।
2017, साहिबाबाद: बिना अनुमति जुलूस और पुलिस पर हमले का मामला। शुरुआत में धारा 307 भी लगी, बाद में हटा दी गई।
2017, कविनगर: अंतरधार्मिक विवाह के विरोध में सड़क जाम और तोड़फोड़।
2018, साहिबाबाद: इफ्तार के दौरान मुस्लिमों पर हमले और धार्मिक भावनाएं भड़काने के आरोप।
2021, दिल्ली: कनॉट प्लेस/जंतर-मंतर पर सांप्रदायिक नारेबाजी का मामला।
2021, साहिबाबाद: अमानतुल्लाह खान के खिलाफ “सिर काटने” का इनाम घोषित करने वाले वीडियो का मामला। बाद में FR लगाकर मामला बंद कर दिया गया।
2023: लोनी और शालीमार गार्डन में समुदाय विशेष के खिलाफ कथित भड़काऊ टिप्पणियों के मामले।
2023, नंदग्राम: ट्रैफिक पुलिसकर्मी से बदसलूकी और धमकी का मामला।
2024, मधुबन बापूधाम: मुस्लिम झुग्गी बस्ती पर हमला, “बांग्लादेशी” बताकर तोड़फोड़ और आगजनी के आरोप। चार्जशीट दाखिल।
2024, साहिबाबाद: मारपीट, धमकी, सरकारी काम में बाधा और संपत्ति से जुड़े मामले। बेटे हर्ष भी नामजद।
दिसंबर 2025/जनवरी 2026, शालीमार गार्डन: सार्वजनिक रूप से तलवारें बांटने और उग्र प्रदर्शन का मामला। पिंकी और उनके बेटे हर्ष गिरफ्तार हुए, बाद में जमानत मिली।

इनके अलावा धारा 144 के उल्लंघन, बिना अनुमति पंचायत/जुलूस, हथियार अधिनियम और गुंडा/गैंगस्टर एक्ट से जुड़े मामले भी रिपोर्ट किए गए हैं। दिल्ली में भी कुछ मामले बताए गए हैं।

अब सवाल सिर्फ मुकदमों की संख्या का नहीं है। सवाल यह है कि इतने मामलों के बावजूद खुलेआम विवादित बयान और ऐलान करने का हौसला आखिर कहां से आता है?न एनकाउंटर, न जेल क्या कानून का डर सिर्फ आम आदमी के लिए है?

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